भारतीय मानक ब्यूरो पर आईएएस कब्जा समाप्त क
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President of India, Prime Minister of India, Speaker Lok Sabha, Chairman Rajya Sabha, Sharad Pawar
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भारतीय संसद ने राष्ट्रीय मानक निर्माण का कार्य भारतीय मानक ब्यूरो (भामाब्यूरो) को सोंपा है, पर अपने ६२ वर्ष के सफ़र में भामाब्यूरो अपने इस राष्ट्रीय दायित्व को भूल गया और दूसरे ही मसलों में उलझ गया. आज भामाब्यूरो में मानक निर्माण का कार्य ठहर सा गया है. अनेक भारतीय संस्थाओं को मानकों की आवश्यकता है और इसके लिए वह भामाब्यूरो से आग्रह करते हैं पर भामाब्यूरो के अधिकारी उन की इस आवश्यकता पर कोई ध्यान नहीं देते. मजबूरन इन संस्थाओं को या तो स्वयं ही मानक बनाने पड़ते हैं, या किसी और संस्था की मदद लेनी पड़ती है. भामाब्यूरो का ध्यान कितनी ही बार इस और दिलाया गया पर उच्च अधिकारी या तो विदेश यात्राओं पर धन और संसाधन नष्ट करते रहते हैं या ओछी राजनीति में समय गंवाते रहते हैं. भामाब्यूरो पर पिछले अनेक वर्षों से आईएएस अधिकारिओं ने कब्ज़ा कर रखा है. इन आईएएस अधिकारिओं को न तो भामाब्यूरो के काम की कुछ समझ है और न ही वह उसे समझने की कोई कोशिश करते हैं. वह एक एक करके भामाब्यूरो में आते हैं, विदेश यात्राएं करते हैं और आनंद पूर्वक समय बिता कर वापस अपने विभागों में चले जाते हैं.
एनडीए सरकार के कार्यकाल में जब बोतल बंद पानी की गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह लगे थे तब संसद ने एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया था. श्री शरद पवार उस समिति के अध्यक्ष थे. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भामाब्यूरो के महा-निदेशक पद पर किसी गणमान्य वैज्ञानिक को नियुक्त किया जाना चाहिए. इस रिपोर्ट को संसद और सरकार ने स्वीकार किया था. संसद के पिछले पांच वर्षों में और अब श्री शरद पवार भारत सरकार में मंत्री हैं और भामाब्यूरो के अध्यक्ष हैं. यह एक विडंबना है कि पवार साहब मंत्री बनते ही समिति के अध्यक्ष के रूप में दी गई अपनी सलाह को भूल गए और एक के बाद एक आईएएस अधिकारियों को भामाब्यूरो का महा-निदेशक बना कर भेजते रहे. जिस भामाब्यूरो में पवार साहब सुधार करना चाहते थे उस में फैली अवव्यवस्था को उन्होंने पूरा संरक्षण प्रदान किया. पवार साहब एक अनुभवी राजनेता हैं. शायद विपक्ष में रह कर कुछ कहना और सत्ता में आकर उस का उल्टा करना उनकी राजनीति का एक जरूरी हिस्सा है. पर एक वैज्ञानिक संस्था के साथ यह राजनीति देश के हित में नहीं है.
आईएएस अधिकारिओं को मानक भवन में भेजकर भामाब्यूरो के साथ अब और खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए. वर्तमान आईएएस अधिकारी को वापस भेज कर किसी गणमान्य वैज्ञानिक को भामाब्यूरो का महा-निदेशक नियुक्त किया जाना चाहिए. भामाब्यूरो एक वैज्ञानिक संस्था है, उसे राजनीति के प्रपंचों से दूर रखा जाना चाहिए.
एनडीए सरकार के कार्यकाल में जब बोतल बंद पानी की गुणवत्ता पर प्रश्न चिन्ह लगे थे तब संसद ने एक संयुक्त संसदीय समिति का गठन किया था. श्री शरद पवार उस समिति के अध्यक्ष थे. इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि भामाब्यूरो के महा-निदेशक पद पर किसी गणमान्य वैज्ञानिक को नियुक्त किया जाना चाहिए. इस रिपोर्ट को संसद और सरकार ने स्वीकार किया था. संसद के पिछले पांच वर्षों में और अब श्री शरद पवार भारत सरकार में मंत्री हैं और भामाब्यूरो के अध्यक्ष हैं. यह एक विडंबना है कि पवार साहब मंत्री बनते ही समिति के अध्यक्ष के रूप में दी गई अपनी सलाह को भूल गए और एक के बाद एक आईएएस अधिकारियों को भामाब्यूरो का महा-निदेशक बना कर भेजते रहे. जिस भामाब्यूरो में पवार साहब सुधार करना चाहते थे उस में फैली अवव्यवस्था को उन्होंने पूरा संरक्षण प्रदान किया. पवार साहब एक अनुभवी राजनेता हैं. शायद विपक्ष में रह कर कुछ कहना और सत्ता में आकर उस का उल्टा करना उनकी राजनीति का एक जरूरी हिस्सा है. पर एक वैज्ञानिक संस्था के साथ यह राजनीति देश के हित में नहीं है.
आईएएस अधिकारिओं को मानक भवन में भेजकर भामाब्यूरो के साथ अब और खिलवाड़ नहीं किया जाना चाहिए. वर्तमान आईएएस अधिकारी को वापस भेज कर किसी गणमान्य वैज्ञानिक को भामाब्यूरो का महा-निदेशक नियुक्त किया जाना चाहिए. भामाब्यूरो एक वैज्ञानिक संस्था है, उसे राजनीति के प्रपंचों से दूर रखा जाना चाहिए.
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